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20 years of life flew like the wind.

This is the truth of life currently my Friends 

 सभी मित्रों को समर्पित ये मार्मिक सच ,मित्रो अश्रु जरूर बहने देना रोकना नहीं बोझ कुछ कम हो जायेगा।   

20 years of life flew like the wind.

Then started the job search Not that, not far away. Doing this 2 .. 3 It was decided to leave the jobs. A little stability started.

Then came the first paycheck check The endless game of the zeros accumulated in the bank and deposited in the starting account. 2- 3 years passed out There was a slight increase in the bank. Been age 27.

And then got married. Ram's story of life began. Started 2 .. 4 years have passed soft, pink, juicy, dreamy. Put your hands in hand and walk around, colorful dreams. But these days flew very soon.

And then the child's arrival was aroused. Cradle began to swing throughout the year. Now all attention has centered on the child. Get up - sit, eat - drinking, caressing

Time did not come quickly, I do not know.
In the meantime, when my hand came out of his hand, talking about it - walking - when it was closed - both did not even know.

The child grew up She got busy in the child, I used to work in my work. Home and car installment, child's responsibility, education and future facilities, as well as concerns about increasing liquor in the bank. He himself also gave up completely in work and I also ....

So in 37 I got it. Home, car, zero in the bank, family are all but there is some shortage? But he does not understand what he is. His irritation grew nervous, I started feeling depressed.

Meanwhile the days passed. Time went on. The child grew up His own world was ready. When I visited the 10th anniversary and did not know. By then both of them had become 40 to 42. The bank went on to increase zero

In an absolute solitude moment, I remembered that day and saw the opportunity and said to him, "Come on here, sit near." Let's go hand in hand and come roaming around. "

He looked at me with a strange sight and said, "You can understand anything here. There is a lot of work left here.
He left the pallu in the waist.

Then came forty-five years, the eyeglasses were on the eyes, the hair started leaving black color, something started to get involved in the brain.

The son was in the college, and the bank was growing there. Seeing her college ended. He stood on his feet Her wings blew and flew abroad;

The black color of his hair also started flying Sometimes the mind started leaving along. He got glasses too. I was sacked myself He also started to feel Umra Raj.

Both of them increased from 55 to 60. There is no news of bank zero. The outgoing programs started to close.

Now the days of the medicines begin to be fixed day and time. Children will grow up then we will be together, the house that was taken care of has become a burden. Thinking about when the children will come back, they start walking on the rest day.

One day, he was enjoying the cool breeze on the sofa. He was doing a wick. Then the phone bell rang. Locked phone picked up. On the other hand was son. Who said that she married and now she will be in the foreign country.

She also said that Father give the zeros of your bank in some old age home. And you also stay the same. By saying some other informal talks, the son kept the phone.

I got back to the couch again. His worship also came to an end. I gave him a voice "Let's talk today with my hand again"
She immediately quote "come now"

I did not believe. The face happily shines Eyes filled up Tears began to fall and the cheeks were wet with eyes. Suddenly, the glare of the eyes fell fade and I became pallid. forever !!

He worshiped the rest and sat down beside me "What were you saying?"

But I said nothing. He touched my body and saw it. The body was completely cold. I was watching her and giggle

In a moment, it became zero.
" what to do? "

He did not understand anything But in a couple of minutes he became conscious. Gently raised worship went into the house An incense sticks. God bowed down. And again came back to sit on the sofa.

Take my cold hand in your hands and say
"Where do you want to walk around? What are you talking about?" say !!

His eyes were filled with saying this ......
Those people have been watching me constantly Tears flow through the eyes. My head fell on his shoulders. The cold breeze was still running.

Is this the only life? ?

All bring their luck together, so take out some time for yourself too. Life is your own, then keep your own way of living. Start from today Because tomorrow will never come.
 This poignant truth devoted to all friends, do not stop the tears of friends, and the burden will be reduced.
This is the truth of life currently my Friends 

जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए ।

फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो , दूर नहीं पास । ऐसा करते करते 2 .. 3 नोकरियाँ छोड़ने एक तय हुई।

थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। 2- 3 वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र 27 हो गयी।

और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के 2 ..  4 साल नर्म , गुलाबी, रसीले , सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।

और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना - बैठना, खाना - पीना, लाड - दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते- करना घूमना - फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।

बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी, मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता।

उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी.... 

इतने में मैं 37 का हो गया। घर, गाडी, बैंक में शुन्य, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब 10वि   anniversaryआई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही 40 42 के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि " तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है।"
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया पैंतालिसवा साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।

उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।

दोनों 55 से 60 की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी पूजा ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी "चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं"
वो तुरंत बोली " अभी आई"।

मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा। आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी " बोलो क्या बोल रहे थे?"

लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।

" क्या करू? "

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली

" चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे?" बोलो !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......
वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।

क्या ये ही जिन्दगी है ? ?

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । 

जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। 

शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा।

 सभी मित्रों को समर्पित ये मार्मिक सच ,मित्रो अश्रु जरूर बहने देना रोकना नहीं बोझ कुछ कम हो जायेगा। 

यही वर्तमान में जीवन की सच्चाई है मेरे साथियों

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