Maybe Nature wants to tell us Something

👏शायद प्रकृती हमसे कुछ कहना चाहती हो👏
अपनो से, अपने आप से, मुलाकात "करो ना" ! 

👏 Maybe Nature wants to tell us Something.

"Do not you", meet yourself, with yourself!

Believe it or not, there is a divine power, which is greater than you, me, us! Who can understand and explain more than you and me!



Do you know that there is such a truth of life hidden in fear of this fast virus, which you and I, till now, were denying?



Perhaps nature wanted to say something to us, but in the mad rage of life, we do not get time to listen to him or anyone, anything.



It is possible that this virus has come to add us again - from our own home, from our own people and our own!



If the airplane's carbon is low, then the sky will also be able to fill oxygen in its lungs.



If the shopping malls, cinema houses have locks for a few days, then perhaps the locks of the heart will open automatically.



There may be more juices from the cinema in the pages of the book. You have time to tell the stories of your life to the children and listen to their innocent stories from them!



Get your bets or carrot pieces closer to you.



It may be known that the house food has more flavor than the restaurant food.



Maybe a wonderful truth is hidden in what is happening.



 The virus may have come to tell us something, to get something done.




 Only for a few days, right only by being helpless, only right after being frightened, we will meet once with our nature, with ourselves, with ourselves.






















मानो या ना मानो, कोई तो दिव्यशक्ती है, जो आपसे, मुझसे, हम सबसे ज्यादा बड़ी है! जो आपसे और मुझसे कहीं ज्यादा समझती और समझा सकती है! 

क्या पता इस तेज वायरस के भय में ज़िन्दगी का कोई ऐसा सच़ छुपा हो, जो आप और मैं, अब तक नकार रहे थे ?

शायद प्रकृति हम से कुछ कहना चाह रही थी पर जीवन की पागल आपा-धापी में हमें वक्त ही नहीं मिलता की हम उसकी या किसी की, कुछ भी सुने।

हो सकता है कि, ये वायरस हमें फिर जोड़ने आया है - अपनी धरा से, अपनों से और अपने आप से!

शायद हवाई जहाज का कार्बन कम हो तो आकाश भी अपने फेफड़ों में ऑक्सीजन भर पाएगा। 

शॉपिंग मॉल, सिनेमा घरों में कुछ दिन के लिए ताले लगे तो शायद दिल के ताले स्वतः ही खुल जाएंगे। 

हो सकता है किताब के पन्नों में सिनेमा से अधिक रस मिले। बच्चों को अपने जीवन के किस्से सुनाने का और उनसे उनकी मासूम कहानियां सुनने का आपको वक्त मिले!

लूड़ो की बाज़ी या कैरम की गोटियां आपको अपनो के करीब ला दे।

शायद पता चल जाए, घर के खाने में रेस्टोरेंट के खाने से ज्यादा स्वाद है।

हो सकता है जो हो रहा है उस में एक अद्भुत सत्य छुपा है।

 ये वायरस शायद हमसे कुछ कहने आया है, कुछ करवाने आया है।

 कुछ दिनों के लिए ही सही, बेबस होकर ही सही, भयभीत होकर ही सही, हम अपनी प्रकृति से, अपनो से, अपने आप से, एक बार मुलाकात तो करेंगे
👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏👏

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