Ideological Movement

🙏🙏🙏वैचारिक आंदोलन🙏🙏🙏

"विज्ञान के समक्ष धर्म के चमत्कार फेल"
https://bit.ly/2QAmZmt अकेला कोरोना वायरस यह साबित करने में 100% सफल रहा कि बीमारियों का इलाज किसी भी धर्म में नहीं है....

Ideological Movement
"Miracles of religion fail in front of science"
The corona virus alone was 100% successful in proving that there is no cure for diseases ....
The cure for diseases is neither in tantra-mantra, nor in chanting, nor in sorcery, nor in sage-sacrifice, nor in havan-yajna, nor in pujapaatha, nor in ritual ....
Apart from this, the treatment of diseases is neither in cow urine, nor in cow dung, neither in Ganges water, nor in any ash.
Corona's treatment is not with any exorcist, nor with any tantric, nor with any Baba.
No devotees are getting the blessings of being treated at any religious place,
Rather
There are locks at religious places .... Even the big legend storytellers have stopped the work of blessing the devotees by calling them in pandals and narrating stories ....
Those who claim to change the constellation and fortune in ₹ 11 / - today, why do they not change the course of corona virus?
People who claim to cure stone idols by applying them, why do they not treat humans by applying plaster to humans?
Those who claim to put their lives in stone idols, why do not those people die today by putting their lives in those who die from Corona?
Now has Tantra-Mantra-Lepa-Prana all become ineffective?
That is, the power of all kinds of tantra-mantra, pujapath, havan-yajna, rituals etc. of all religions has failed in front of the corona virus….
All the devotees, devotees, contractors have lost faith in religious powers in front of Corona virus….
That is why today a crowd of devotees are running towards doctors and hospitals to save lives from the corona virus, not towards religious places, exorcists, tantrikas and babas….
Friends, cure of diseases is possible only and only in science
And
That is why doctors and nurses are treating patients suffering from Corona virus today ....
If the Manuwadi government of the devotees had built medical colleges and hospitals in the last 06 years instead of having temples and idols and organizing religious fairs, today the facilities for the treatment of serious diseases in the country would have been available in sufficient quantity ....
That's why
From Tathagata Buddha to Sant Kabir, Sant Ravidas, Mahatma Jyotiba Phule, Mata Savitribai Phule, Dr. Periyar Saheb and Dr. Ambedkar Saheb have denied the existence of any kind of divine power,

But
Till date people used to think all this nonsense

And
Since the corona virus epidemic,
Since then everyone has understood that there is no existence of any divine power of any kind which can save them from diseases like science….
One thing is to listen openly that the treatment of diseases is not possible in religious places, but only in scientific places i.e. hospitals ....
Along with this, there is an appeal to the government to also take legal action against those who have given unrestrained treatment to cow urine and cow dung,
Because
In West Bengal, after drinking cow urine, a person has to be hospitalized due to deteriorating health and hundreds of such cases are happening all over the country….
Apart from this, the government should make the most robust security arrangements to protect the scavengers from the corona virus ....
The government and its devotees still have time to move towards science instead of pushing the people of the country into superstition in the name of religion….

In the end, it can be said firmly that there is no remedy or cure in any religion to prevent any kind of disaster, calamity, disease and epidemic ....

If you find this article appropriate in terms of awareness, then you should bother sending it to 10-20 people and groups.

https://bit.ly/2QAmZmt
Thank you .... 🙏🙏




बीमारियों का इलाज ना तंत्र-मंत्र में है, ना झाड़फूंक में है, ना टोना-टोटकों में है, ना हवन-यज्ञ में है, ना पूजापाठ में है और ना अनुष्ठान में है....

इसके अलावा बीमारियों का इलाज ना गौमूत्र में है, ना गोबर में है, ना गंगाजल में है, ना किसी भस्म में है....

कोरोना का इलाज ना किसी ओझा के पास है, ना किसी तांत्रिक के पास है, ना किसी बाबा के पास है....

ना भक्तों को किसी धार्मिक स्थल पर इलाज होने का आशीर्वाद मिल रहा है,

बल्कि

धार्मिक स्थलों पर तो ताले लगे पड़े हैं....

यहां तक कि बड़े -बड़े दिग्गज कथावाचकों ने भी भक्तों को पांडालों में बुलाकर कथाएं सुनाकर आशीर्वाद देने का काम बंद कर दिया है....

जो लोग 11/-₹ में नक्षत्र और भाग्य बदलने का दावा करते हैं, आज वो लोग कोरोना वायरस का रास्ता क्यों नहीं बदल देते हैं?

जो लोग पत्थर की मूर्तियों के लेप लगाकर उनके इलाज करने का दावा करते हैं, आज वो लोग इंसानों के लेप लगाकर इलाज क्यों नहीं कर देते हैं?

जो लोग पत्थर की मूर्तियों में प्राण डालने का दावा करते हैं, आज वो लोग कोरोना से मरने वालों में प्राण डालकर जिंदा क्यों नहीं कर देते हैं?

अब क्या तंत्र-मंत्र-लेप-प्राण फूंकना सब बेअसर हो गए हैं?

यानि कोरोना वायरस के सामने सभी धर्मों के सभी प्रकार के तंत्र-मंत्र, पूजापाठ, हवन-यज्ञ, अनुष्ठान आदि की शक्ति फेल हो गई है....

कोरोना वायरस के सामने सभी भक्तों, अंधभक्तों, ठेकेदारों का धार्मिक शक्तियों पर से विश्वास उठ गया है....

इसीलिए आज भक्तों की भीड़ कोरोना वायरस से जान बचाने के लिए डॉक्टरों और अस्पतालों की ओर दौड़ रही है, धार्मिक स्थलों, ओझाओं, तांत्रिकों और बाबाओं की ओर नहीं....

साथियों, बिमारियों का इलाज तो केवल और केवल विज्ञान में ही संभव है

और

इसीलिए आज कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों का इलाज डॉक्टर और नर्सेज ही कर रहे हैं....

अगर भक्तों की मनुवादी सरकार पिछले 06 सालों में मंदिर और मूर्तियां बनवाने व धार्मिक मेलें आयोजित करवाने के बजाय मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बनवाती तो आज देश में गंभीर से गंभीर बीमारियों का इलाज कराने की सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होती....

इसीलिए

तथागत बुद्ध से लेकर संत कबीर, संत रविदास, महात्मा ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले, डॉ पेरियार साहब और डॉ अम्बेडकर साहब तक ने किसी भी प्रकार की देवीय शक्ति के अस्तित्व को नकारा ही है,

परन्तु

आज तक लोगों को यह सब बकवास लगता था

और

जब से कोरोना वायरस की महामारी आई है,

तब से सबको समझ में आ गया है कि किसी भी प्रकार की कोई भी देवीय शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है जो विज्ञान की तरह उनको बीमारियों से बचा सके....

एक बात कान खोलकर सुन लेना कि बीमारियों का इलाज धार्मिक स्थानों पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक स्थानों यानि अस्पतालों में ही संभव है....

इसके साथ ही सरकार से एक अपील और भी है कि कोरोना वायरस का गौमूत्र और गोबर से अनर्गल इलाज बताने वालों के खिलाफ भी कानूनन कार्यवाही करने का कष्ट करें,

क्योंकि

पश्चिम बंगाल में गौमूत्र पीने से एक व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है और ऐसे सैकड़ों मामले देशभर में घटित हो रहे हैं....

इसके अलावा सरकार को सफाईकर्मियों को कोरोना वायरस से बचाने के लिए सुरक्षा के सबसे ज्यादा पुख्ता इंतजाम करने करने चाहिए....

सरकार और उसके अंधभक्तों के पास अभी भी समय है कि वो देश की जनता को धर्म के नाम पर अंधविश्वास में धकेलने के बजाय विज्ञान की ओर अग्रसर करें....

अंत में यह बात दृढतापूर्वक कही जा सकती है कि किसी भी धर्म में किसी भी प्रकार की आपदा, विपदा, बीमारी और महामारी से बचाने के लिए कोई भी उपाय या इलाज नहीं है....

अगर आपको यह लेख जागरूकता के लिहाज से उचित लगे तो इसे 10-20 लोगों व ग्रुपों में आगे भेजने का कष्ट करें....
https://bit.ly/2QAmZmt धन्यवाद....🙏🙏


कोरोनावायरस: कम टेस्टिंग कर बड़ी गलती कर रहा है भारत
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ये जो इंडिया है ना.. इसे कोरोनावायरस से निपटने के लिए बड़ी साफ रणनीति बनानी पड़ेगी.. और इसका सबसे अहम पहलू है कोरोनावायरस की टेस्टिंग को लेकर रणनीति... यानी कोरोनावायरस की जांच को लेकर हमारी क्या रणनीति  है?

आखिर.. ये कई जिंदगियों का सवाल है.

फरवरी की शुरुआत तक भारत ने करीब 12,000 टेस्ट किए. इसकी तुलना दक्षिण कोरिया से कीजिए, जो अब तक करीब ढाई लाख टेस्ट कर चुका है, मतलब हर रोज करीब 10,000 टेस्ट. भारत ने औसतन 10 लाख लोगों में 5-10 टेस्ट किए हैं, जबकि दक्षिण कोरिया का औसतन 10 लाख में 4,000 का है. साफ है कि टेस्टिंग को लेकर कोरिया और भारत का रुख बिलकुल अलग-अलग है.

तो कोरोनावायरस की ये आटे में नमक जैसी टेस्टिंग को लेकर भारत का लॉजिक क्या है? इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) का कहना है कि फिलहाल वो ‘Symptomatic Testing’ कर रहे हैं, मतलब वो उन लोगों का टेस्ट कर रहे हैं जो कोरोनावायरस के ज्यादा असर वाले देशों से लौटे हैं (और उन देशों की लिस्ट अब जाहिर तौर पर काफी लंबी हो चुकी है) या फिर वो, जो कोरोनावायरस लोगों के संपर्क में आए हैं. और उनमें से भी पहले उन लोगों की टेस्टिंग होती है जिन्हें सूखी खांसी, बुखार या सांस लेने में तकलीफ जैसे कोरोना के लक्षण हों.

अब क्योंकि हम कम टेस्टिंग कर रहे हैं, तो हो सकता है कि हम सभी पॉजिटिव मामलों की पहचान ही ना कर पा रहे हों और ये खतरनाक क्यों है? ये खतरनाक इसलिए है क्योंकि ये हमें एक और इटली बना सकता है!

आप सोच रहे होंगे कि इटली क्यों? क्योंकि हम सब जानते हैं कि इटली पर इस वक्त कोरोनावायरस का सबसे ज्यादा कहर है. इटली में 40,000 से ज्यादा पॉजिटिव मामले हैं. 3,400 से ज्यादा मौत हो चुकी हैं. पूरे देश में तालाबंदी है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ दिन पहले- 15 फरवरी को इटली में सिर्फ 3 पॉजिटिव केस थे और दक्षिण कोरिया में 28? कोरिया में आज 9000 से भी कम पॉजिटिव मामले हैं और 100 से भी कम मौत हुई हैं. इटली से बहुत कम. तो फिर कोरिया ने क्या जादू किया जो इटली नहीं कर पाया? वो है ज्यादा से ज्यादा लोगों की टेस्टिंग.

शायद भारत को इससे सीखने की जरूरत है. दक्षिण कोरिया ने फैसला किया कि जिस किसी में भी कोरोनावायरस के लक्षण होंगे, उनकी जांच होगी, चाहे उन्होंने यात्रा की हो या नहीं, चाहे वो किसी पीड़ित के संपर्क में आएं हो या नहीं. इसके साथ ही उन्होंने ये भी पक्का किया कि उनके पास इतने ज्यादा लोगों की जांच की क्षमता हो. उन्होंने जनवरी से ही अपने यहां टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाना शुरू किया. दूसरी तरफ, इटली ने बड़े पैमाने पर टेस्टिंग में, लोगों को अलग-थलग करने में देरी की और इसकी बड़ी कीमत इटली को चुकानी पड़ रही है.

इसलिए मैं फिर पूछता हूं... क्या भारत को वही नहीं करना चाहिए जो दक्षिण कोरिया ने किया? कुछ लोग कह रहे हैं कि हमारी बड़ी आबादी को देखते हुए महज 150 के करीब मामले ज्यादा नहीं हैं, लेकिन यही तो मुद्दा है कि ये संख्या छोटी इसलिए भी हो सकती है क्योंकि हमें मालूम ही नहीं कि कितने लोग पॉजिटिव हैं और इसकी वजह फिर से वही कि हम शायद पर्याप्त संख्या में टेस्ट ही नहीं कर रहे.

अब ट्रंप के अमेरिका को ही देख लीजिए. मैं ट्रंप का अमेरिका कह रहा हूं क्योंकि शुरू में ट्रंप ने टेस्टिंग को लेकर नानुकूर किया, लॉकडाउन और क्वॉरन्टीन को लेकर लापरवाही बरती. नतीजा ये हुआ कि अमेरिका में बहुत कम लोगों के टेस्ट हुए और अब वहां 14,500 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.


अभी भारत में कोरोनावायरस के कारण 4 लोगों की ही मौत हुई है, इसलिए यही समय है कि हम तय कर लें कि हमें किस-किसकी और कितनी टेस्टिंग की जरूरत है. अभी भारत में कोरोनावायरस की महामारी स्टेज 2 पर है, ये अभी कम ही लोगों को बीमार कर रहा है, इसे लोकल ट्रांसमिशन कहते हैं, लेकिन खुदा न खास्ते एक बार ये स्टेज 3 पर पहुंच गया तो बड़ी तादाद में लोगों को बीमार करेगा.

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