Pulwama Attack

सरकार केवल इतना बता दे कि जवानों के नाम पर जमा पैसे का क्या हुआ ? "........
https://bit.ly/2StFzhz The Pulwama Attack has been completed for a year today, exactly one year before 44 Central Reserve Police Force (CRPF) personnel were killed in a suicide attack in Pulwama, Kashmir. When the bus carrying them was hit by a car, there was a huge amount of explosives in the car.

The invoice for the investigation of the Pulwama attack that shook the country has not been presented even after a year has passed. The outline of the attack has been known, but what role did the person have, it is not yet understood. The NIA investigating the case has identified several people in the attack. The NIA is still looking for a Pakistan connection to this attack. But clearly nothing has been done yet.

In this attack, the biggest role of the lapse on the security front has been played, but the Modi government has always avoided talking about it, in fact intelligence agencies were anticipating such an attack. On the occasion of the anniversary of Maqbool Butt, a major incident of terrorists was being feared, an alert was also issued in this regard on February 8. It was said that terrorists in Jammu and Kashmir can attack convoys of security forces through IEDs and hence attention should be paid to security. But no arrangements were made

Due to the closure of the highway, the crowd of soldiers was increasing in the transit camp in Jammu. In the case of such alerts, usually the soldiers are sent by plane taking precaution, it is said that the CRPF personnel trapped in Jammu due to snowfall since February 4, also sought approval to reach Srinagar by air. The CRPF officials made a proposal and sent it to the headquarters.
Officers kept demanding special aircraft for a week, but after the Modi government refused the request of CRPF officers to provide the aircraft, it was decided to send 2500 soldiers in 78 buses by road only. The convoy left Jammu for Srinagar at 1430 hrs on 14 February. After 3:00 pm there was a terrorist attack.

Another important thing is that there is a fixed procedure for the movement of security forces in areas like Jammu and Kashmir. Before passing his convoy, the road opening party, ie ROP, responsible for the security of the area concerned, gives the green signal for this. The ROP consists of soldiers from the Army, Jammu and Kashmir Police and paramilitary forces. According to experts, before leaving Jammu at 3:30 in the morning on Thursday, the ROP gave the green signal to secure the road. The question is that despite this, how did the attacker reach the highway with a 60 kg explosive-laden car. Also where did he get so much explosive? No answer has been given to this matter yet

The CRPF personnel who died in this attack have not been officially given the status of martyr till date, the paramilitary forces killed in action do not fall in the category of martyr. But martyrs and martyrs are called votes in their name…. A BBC report shows how the Modi government at the Center has ignored the martyrs of Pulwama …….

Seven crore rupees were deposited within 36 hours in the "Veer Bharat Corps" fund to provide financial help to the families of the soldiers killed after the Pulwama attack. It was revealed by quoting RTI that till August 2019 a total of Rs 258 crore was deposited in this fund, the father of Bihar martyr Ratan is asking that "We don't need anything from the government now. We have seen them. But the government only told them Give what happened to the money deposited in the name of the soldiers? "........






पुलवामा हमले को आज एक साल पूरा हो गया, आज से ठीक एक साल पहले कश्मीर के पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के 44 जवान एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे. जब उन्हें ले जा रही बस को कार से टक्कर मार दी गयी थी कार में भारी मात्रा में विस्फोटक था। 

देश को हिला कर रख देने वाले पुलवामा हमले की जांच का चालान एक साल गुजर जाने के बाद भी पेश नहीं हो सका है। हमले की रूपरेखा तो पता चल चुकी है लेकिन व्यक्तिगत तौर पर किस शख्स का क्या रोल था, यह अब तक समझ में नहीं आ रहा। मामले की जांच कर रही एनआईए ने इस हमले में कई लोगों की पहचान की है। एनआईए इस हमले के पाकिस्तान कनेक्शन की तलाश ही कर रही है।लेकिन स्पष्ट रूप से अभी तक कोई बात नही की गई है

इस हमले में सुरक्षा के मोर्चे पर हुई चूक की सबसे बड़ी भूमिका रही है लेकिन मोदी सरकार इस बारे में हमेशा बात करने से बचती आई है दरअसल खुफियां एजेंसियों को इस तरह के हमले का अंदेशा था. मकबूल बट की बरसी को लेकर आतंकियों के बड़ी वारदात की आशंका जताई जा रही थी, आठ फरवरी को इस सिलसिले में एक अलर्ट भी जारी किया गया था. इसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी आईईडी के जरिये सुरक्षा बलों के काफिले हमला कर सकते हैं और इसलिए सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए. लेकिन कोई इंतजाम नही किया गया

हाईवे बंद रहने के कारण जम्मू स्थित ट्रांजिट कैंप में जवानों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. ऐसे अलर्ट के मामले में आमतौर पर जवानों को एहतियात बरतते हुए विमान से भेज दिया जाता है बताया जाता है कि 4 फरवरी से बर्फबारी के कारण जम्मू में फंसे सीआरपीएफ के जवानों को भी हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंचने की मंजूरी मांगी गई थी। सीआरपीएफ के अधिकारियों ने इसका प्रस्ताव बनाकर मुख्यालय भेजा था।
अधिकारी एक हफ्ते तक विशेष विमान की मांग करते रहे लेकिन मोदी सरकार ने  सीआरपीएफ अधिकारियों के विमान मुहैया करवाने के निवेदन को अस्वीकार कर दिया था इसके बाद ही 2500 जवानों को 78 बसों में सड़क मार्ग से ही भेजने का निर्णय लिया गया. यह काफिला 14 फरवरी को सुबह साढ़े तीन बजे जम्मू से श्रीनगर के लिए रवाना हो गया। दोपहर बाद 3:15 बजे आतंकी हमला हो गया।

एक महत्वपूर्ण बात और है जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के आवागमन के लिए एक तय प्रक्रिया बनी हुई है. उनका काफिला गुजरने से पहले संबंधित इलाके की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार रोड ओपनिंग पार्टी यानी आरओपी इसके लिए हरी झंडी देती है. आरओपी में सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल होते हैं. जानकारों के मुताबिक गुरुवार को तड़के साढ़े तीन बजे जम्मू से निकलने से पहले आरओपी ने रास्ते के सुरक्षित होने की हरी झंडी दे दी थी. सवाल है कि इसके बावजूद 60 किलो विस्फोटक से लदी कार लेकर हमलावर हाईवे पर कैसे पहुंच गया. यह भी कि उसे इतना विस्फोटक कहां से मिला? इस बात का भी अभी तक कोई जवाब नही दिया गया है

जो सीआरपीएफ़ के जवान इस हमले में मारे गए उनको आज तक आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा नही दिया गया है एक्शन में मारे जाने वाले अर्धसैनिक बलों के जवान शहीद की श्रेणी में नहीं आते. लेकिन शहीद-शहीद कह के उनके नाम पर वोट खूब मांगे जाते हैं .....बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती हैं कि किस प्रकार केंद्र की मोदी सरकार ने पुलवामा के शहीदों की उपेक्षा की है ........


पुलवामा हमले के बाद मारे गए जवानों के परिवारों को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए बने "वीर भारत कोर" फ़ंड में 36 घंटे के भीतर ही सात करोड़ रुपए जमा हो गए थे. आरटीआई के हवाले से यह पता चला था कि अगस्त 2019 तक इस फ़ंड में कुल 258 करोड़ रुपये जमा थे बिहार के शहीद रतन के पिता पूछ रहे है कि  "हमें अब सरकार से कुछ नहीं चाहिए. 

हमने देख लिया उनको. लेकिन सरकार केवल इतना बता दे कि जवानों के नाम पर जमा पैसे का क्या हुआ?"........





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